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पिछले अंक में आपने पढ़ा सद्‌गुरु, शेरिल सिमोन और लीला के साथ आधी रात में नौका विहार पर निकले… पढ़ें धारावाहिक ‘मिडनाइट विद द मिस्टिक’ के हिंदी अनुवाद की अगली कड़ी:

पिछले अंक में आपने पढ़ा सद्‌गुरु, शेरिल सिमोन और लीला के साथ आधी रात में नौका विहार पर निकले… पढ़ें धारावाहिक ‘मिडनाइट विद द मिस्टिक’ के हिंदी अनुवाद की अगली कड़ी:


time
थोड़ी देर बाद हम एक छोटे-से निर्जन टापू के पास पहुंच गए। सद्‌गुरु ने नाव को बड़ी कुशलता के साथ एक रेतीली जगह तक पहुंचाया। लीला और मैं नाव को बांधने में लग गयीं और सद्‌गुरु ने एक साफ मैदानी जगह में फुर्ती से आग जला दी। हम उनके पास पहुंच गए और हम सब गर्म लपटों के इर्द-गिर्द बैठ गए। कुछ पलों के सन्नाटे के बाद सद्‌गुरु ने एक ऊर्जावान, हृदय को छू लेने वाले मंत्र का उच्चारण आरंभ कर दिया। उनका मंत्रोच्चारण (मंत्र बोलना) सम्मोहित-सा (हिप्नोटाईज) कर देता है।
नाद ब्रह्म विश्वस्वरूपा
नाद ही सकल जीवरूपा
नाद ही कर्म नाद ही धर्म
नाद ही बंधन नाद ही मुक्ति
नाद ही शंकर नाद ही शक्ति
नादम् नादम् सर्वम् नादम्
नादम् नादम् नादम् नादम्
धीरे-धीरे उनका स्वर मौन में समा गया और हम तीनों थोड़ी देर तक आनंदमय शांति में डूबे बैठे रहे। फिर मैंने सद्‌गुरु से उस सुंदर मंत्र का अर्थ बताने को कहा।
उन्होंने कहा, ‘सीधा-सीधा अनुवाद करूं तो इसका अर्थ है ‘ध्वनि ब्रह्म है, ब्रह्मांड की अभिव्यक्ति है। ध्वनि जीवन के सभी रूपों में अभिव्यक्त होती है। ध्वनि बंधन है, ध्वनि ही मुक्ति का माध्यम है। ध्वनि हर वस्तु के पीछे की शक्ति है, ध्वनि ही सब-कुछ है।’
मैंने इस अर्थ के बारे में सोचा, फिर मुझे याद आया कि बाइबिल में भी कुछ स्थानों पर ‘एक शब्द’ और उसके सर्वोपरि महत्व का वर्णन है – ‘आरंभ में शब्द था, शब्द ईश्वर के साथ था और यह शब्द ही ईश्वर था।’ मुझे लगा कि सभी आध्यात्मिक परंपराओं के बीच एक जुड़ाव है।

इस दुनिया में जिसने किसी भी तरह का आध्यात्मिक पागलपन दिखाया, उसे हमेशा सताया गया है। मंसूर अल-हलाज भी ऐसे ही सूफी संत थे। जानिए उनकी शख्सियत के कुछ पहलुओं कोः

मंसूर अल-हलाज सूफीवाद के सबसे विवादास्पद व्यक्तियों में से एक थे। उन्होंने दावा किया था ‘मैं ही सत्य हूं’ जिसे धर्म विरोधी माना गया और इस कारण उन्हें पचपन साल की उम्र में बड़ी बेरहमी के साथ मौत की सजा दे दी गई। हालांकि सच्चे ईश्वर-प्रेमी समझते थे कि उनके यह कहने का क्या मतलब है, और वो उनका बड़ा आदर करते थे, और आज भी करते हैं।
बात उन दिनों की है जब मंसूर बगदाद में थे। अपने सूफी गुरु जुनैद से उन्होंने कई विवादास्पद सवाल किए, लेकिन जवाब देने के बजाय जुनैद ने कहा, ‘एक समय ऐसा आएगा, जब लकड़ी के एक टुकड़े पर तुम लाल धब्बा लगाओगे।’
जब जल्लाद ने उनका सिर काटा तो उनके धड़ से खून की धार फूट पड़ी और तेज आवाज आई, ‘मैं सत्य हूं।‘ अचानक उनके शरीर से कटा एक-एक अंग चीखने लगा ‘मैं ही सत्य हूं।’ इसके बाद उन पर उंगली उठाने वालों को अहसास होने लगा कि उन्होंने खुदा के एक लाडले की हत्या कर दी है।
उन्होंने इस बात से इशारा कर दिया था कि एक दिन मंसूर को फांसी के तख्ते पर लटका दिया जाएगा। इस पर मंसूर ने जवाब दिया, ‘जब ऐसा होगा, तो आपको अपना सूफी चोला उतार कर एक धार्मिक विद्वान का चोला धारण करना होगा।’ यह भविष्यवाणी तब सच हुई जब मंसूर की मौत का हुक्मनामा तैयार किया गया और जुनैद से उस पर दस्तखत करने को कहा गया। हालांकि जुनैद दस्तखत नहीं करना चाहते थे, लेकिन बगदाद के खलीफा इस बात पर अड़ गए कि जुनैद को दस्तखत करने ही होंगे। खैर, जुनैद ने अपना सूफी चोला उतार दिया और एक धार्मिक विद्वान की तरह पगड़ी और अंगरखा पहन कर इस्लामिक अकादमी पहुंचे। वहां उन्होंने यह कहते हुए मौत के फरमान पर दस्तखत किए कि ’हम मंसूर हलाज के बारे में फैसला सिर्फ बाहरी सत्य के आधर पर कर रहे हैं। जहां तक भीतरी सत्य की बात है, तो इसे सिर्फ खुदा ही जानता है।
जुनैद से मिलने के बाद अगले पांच साल तक उन्होंने एक ऊच्च आध्यात्मिक अवस्था में मध्य एशिया और ईरान के कई इलाकों की यात्रा की। विद्वानों और आम लोगों, दोनों ने ही उनकी शिक्षाओं और प्रवचन को हाथों हाथ लिया और उनकी भरपूर प्रशंसा की। अपनी तीखी परख के कारण वे ’हलाज’ यानी रहस्यों के उस्ताद के रूप में जाने गए। वे बसरा से मक्का तीर्थयात्रा पर गए, लेकिन यहां उन पर जादूगर का ठप्पा लगा दिया गया। इसके बाद वह भारत और चीन की यात्रा पर निकल पड़े, जहां उन्हें एक प्रबुद्ध गुरू के रूप में पहचान मिली।
उन्होंने मक्का की अपनी दूसरी हज यात्रा की और वहां दो साल तक रहे। लेकिन उनके आध्यात्मिक सीख बांटने के तरीके में एक बड़ा बदलाव आ चुका था। उनकी शिक्षाएं अब बहुत गूढ़ हो चुकी थीं और ‘मैं ही सत्य हूं’ का दावा करके वे लोगों को एक ऐसे ’सत्य’ की ओर आकर्षित करने लगे जो लोग शायद समझ नहीं सके। उनके द्वारा किए गए चमत्कारों के बारे में कई किस्से फैलने लगे। लोग उनके बारे में तरह-तरह की राय रखने लगे। कहा जाता है कि ‘मैं ही सत्य हूं’ के धर्म विरोधी दावे की वजह से उन्हें करीब पचास इस्लामिक शहरों से खदेड़ दिया गया था।
मक्का की दूसरी हज यात्रा पर करीब चार हजार लोग हलाज के साथ गए थे। पूरे एक साल तक वह काबा के सामने नंगे पैर और नंगे सिर ऐसे ही खड़े रहे। रोज एक आदमी उनके सामने कुछ रोटियां और एक जग पानी रख जाता, लेकिन कभी-कभार ही ऐसा हुआ कि हलाज ने उन रोटियों और पानी को हाथ लगाया। नतीजा हुआ कि उनका शरीर हड्डियों का ढांचा भर रह गया।
बगदाद वापस आने पर कट्टरपंथी धार्मिक लोगों ने उन पर धर्मविरोधी होने का आरोप लगाया और उन्हें एक साल के लिए जेल में डाल दिया। जेल में शुरु के छह महीनों तक लोग लगातार उनसे सलाह लेने आते रहे, लेकिन जब खलीफा को इस बात का पता चला तो उसने हुक्म दिया कि हलाज से कोई नहीं मिल सकता। जिस जेल में हलाज को बंद किया गया था, उसमें तीन सौ कैदी थे। 
अपने सूफी गुरु जुनैद से उन्होंने कई विवादास्पद सवाल किए, लेकिन जवाब देने के बजाय जुनैद ने कहा, ‘एक समय ऐसा आएगा, जब लकड़ी के एक टुकड़े पर तुम लाल धब्बा लगाओगे।’ उन्होंने इस बात से इशारा कर दिया था कि एक दिन मंसूर को फांसी के तख्ते पर लटका दिया जाएगा।
एक रात हलाज ने उन कैदियों से पूछा कि क्या आप लोग जेल से आजाद होना चाहते हैं? कैदियों के ‘हां’ कहने पर हलाज ने अपनी उंगली से एक रहस्यपूर्ण इशारा किया। अचानक सभी हथकड़ियां और ताले टूट गए और जेल के दरवाजे खुल गए। सारे कैदी जेल से भागने लगे लेकिन हलाज नहीं भागे। भाग रहे कैदियों ने हलाज से जब उनके नहीं भागने का कारण पूछा तो हलाज ने जवाब दिया, ‘मेरा ’मालिक’ के साथ कुछ गुप्त मामला चल रहा है, जिसका खुलासा सिर्फ फांसी के तख्ते पर ही हो सकता है। मैं अपने मालिक – खुदा का कैदी हूं।’
इस घटना के बाद खलीफा ने उन्हें मौत की सजा सुना दी। कहा जाता है कि बगदाद में एक लाख लोग उनकी फांसी को देखने के लिए इकठ्ठे हुए। पांच सौ कोड़े मारने के बाद उनके हाथ-पैरों को काट दिया गया, उनकी आंखें निकाल ली गईं और जीभ को भी काट दिया गया। उनके क्षत-विक्षत शरीर को ऐसे ही तड़पने के लिए छोड़ दिया गया। कुछ समय में ही उनकी मौत हो गई। जब जल्लाद ने उनका सिर काटा तो उनके धड़ से खून की धार फूट पड़ी और तेज आवाज आई, ‘मैं सत्य हूं।‘ अचानक उनके शरीर से कटा एक-एक अंग चीखने लगा ‘मैं ही सत्य हूं।’ इसके बाद उन पर उंगली उठाने वालों को अहसास होने लगा कि उन्होंने खुदा के एक लाडले की हत्या कर दी है।
मंसूर भारत में धर्म ग्रंथों और उन चीजों को सिखाने आए थे, जो वे जानते थे। वे बस इन्हीं सब चीजों के बारे में बात करते थे। लेकिन जब वह गुजरात और पंजाब पहुंचे तो उनकी मुलाकात कुछ ऐसे सच्चे आध्यात्मिक दीवानों से हुई, जो परमानंद की एक अलग ही अवस्था में थे।
जब वह वापस लौटे तो बस एक लंगोटी पहने हुए थे। जिस समाज से वे आए थे, उसमें अगर कोई आदमी केवल लंगोटी पहने यूं ही सड़कों पर घूमता दिखे, तो उसे घोर पागल समझा जाता था। अपने भीतर परम आनंद का अनुभव कर रहे हलाज ने कहना शुरू कर दिया, ‘मैं कुछ नहीं हूं, मैं कोई नहीं हूं।’ इसके बाद वह पागलों की तरह सड़कों पर नाचने-गाने लगे।
जब आप परम आनंद की अवस्था में होते हैं तो आपके व्यक्तित्व का ढांचा जो सख्त होता है, वह ढीला पड़ जाता है। मानो भट्टी में पूरी तरह पका हुआ मिट्टी का बरतन फिर से कच्ची मिट्टी का बरतन बन जाए। वह फिर से नरम और लचीला हो जाता है।
इस घटना के बाद खलीफा ने उन्हें मौत की सजा सुना दी। कहा जाता है कि बगदाद में एक लाख लोग उनकी फांसी को देखने के लिए इकठ्ठे हुए। पांच सौ कोड़े मारने के बाद उनके हाथ-पैरों को काट दिया गया।
आप उसे जैसा चाहें, फिर से एक नया रूप, एक नया आकार दे सकते हैं। कभी आपने महसूस किया है कि जब लोग मस्ती में होते हैं तो वे बहुत लचीले हो जाते हैं और जब नाखुश होते हैं तो वही लोग बहुत सख्त हो जाते हैं, बिल्कुल लकड़ी की तरह।
जब लोगों ने देखा कि मंसूर पर पागलपन सवार हो गया है तो उन्होंने उनसे दूरी बनानी शुरू कर दी, पर उन्होंने उनका ज्यादा विरोध नहीं किया। लेकिन जैसे ही उन्होंने कहा कि ‘मैं खुदा हूं’ तो उन पर तमाम तरह के आरोप लगाए जाने लगे। वह मक्का जा पहुंचे। वहां हर कोई काबा के चक्कर लगा रहा था। उन्होंने सोचा कि यहां इतनी भीड़ क्यों है? हर कोई यहीं क्यों चक्कर लगा रहा है? उन्होंने वहां से हट कर पास की एक गली में एक और पत्थर की स्थापना कर दी। संभवतः उन्होने उस पत्थर में प्राण-प्रतिष्ठा कर दी थी। उन्होंने देखा कि उन दोनों जगहों की ऊर्जा एक जैसी थी। फिर उन्होंने लोगों से कहा, ‘काबा में बहुत ज्यादा भीड़ है। सबको उसी एक जगह पर घूमने की कोई जरूरत नहीं है। कुछ लोग इस पत्थर के चारों ओर भी घूम सकते हैं।’
बस इतना कहना काफी था। इसके लिए मंसूर को भयंकर सजा दी गई। उनकी खाल उधेड़ दी गई, उन्हें कमर तक जमीन में गाड़ दिया गया और उस जगह के खलीफा ने हुक्म दिया कि जो कोई भी उस गली से गुजरेगा, उसे उन्हें पत्थर मारना ही होगा। बिना उन्हें पत्थर मारे आप उस गली से नहीं गुजर सकते।
जब उनका एक करीबी दोस्त उधर से गुजरा, तो उसे भी उन पर कुछ फेंकना था। उसकी जब पत्थर फेंकने की हिम्मत नहीं हुई तो उसने उनकी ओर एक फूल फेंक दिया। तभी मंसूर के मुंह से एक कविता फूट पड़ी, जिसमें उन्होंने कहा- ‘मुझ पर फेंके गए पत्थरों ने मुझे कष्ट नहीं दिया, क्योंकि इन पत्थरों को अज्ञानी लोगों ने फेंका था। लेकिन तुमने जो फूल मुझ पर फेंका, इससे मुझे गहरी तकलीफ हुई है, क्योंकि तुम तो ज्ञानी हो और फिर भी तुमने मुझ पर कोई चीज फेंकी।’
इस दुनिया में जिसने भी किसी तरह का आध्यात्मिक पागलपन दिखाया है, उसे हमेशा सताया गया है।
वियोग जन्म देता है बोध को
बोध- प्रेम के सच्चे मार्ग का बोध
प्रेम जो कुछ नहीं चाहता
जिसे नहीं है, जरूरत किसी की
अपने प्रियतम की भी नहीं,
क्योंकि यथार्थ की ऐसी हालत में
प्रेमी और प्रियतम नहीं होते हैं दो
अलग-अलग, नहीं कभी
दो हो जाते हैं एक।
एक साथ, सदा के लिए!
गौर फरमाइए, सूफियों का रहस्य है यही
मंसूर अल-हलाज कहते हैं
‘अनल हक’
देखो! एक सच्चा प्रेमी पूर्ण समर्पण कर विलीन हुआ
समा गया उस दिव्य प्रियतम के चरम प्रेम में
मैं वही हूं, जिसे मैं प्रेम करता हूं
और जिसे मैं प्रेम करता हूं, वह मैं हूं
हम दो आत्माएं हैं
जो एक ही शरीर में हैं
अगर तूने मेरे दर्शन कर लिए
समझ ले तूने उसके दर्शन कर लिए
– मंसूर
मौत की सजा मिलने से पहले अपने पुत्र को हलाज की आखिरी सीखः
‘पूरी दुनिया मानती है की नैतिक व्यवहार खुदा की ओर ले जाता है।’ हलाज कहते हैं, ‘लेकिन खुदा की कृपा पाने की कोशिश करो। अगर तुम्हें उसकी कृपा का एक कण भी मिल गया, तो वह देवताओं और इंसानों के तमाम भलाई के कामों से ज्यादा कीमती है।’
बीस साल तक हलाज एक ही फटा-चिथड़ा सूफी चोला पहने रहे। एक दिन उनके कुछ चेलों ने उनके उस चोले को जबरदस्ती उतारने की कोशिश की, ताकि उन्हें नए कपड़े पहना सकें। जब पुराने चोले को उतारा गया तो पता चला कि उसके भीतर एक बिच्छू ने अपना बिल बना लिया है। हलाज ने कहा, ‘यह बिच्छू मेरा दोस्त है, जो पिछले बीस साल से मेरे कपड़ों में रह रहा है।’ उन्होंने अपने चेलों से जिद की कि तुरंत उनके पुराने चोले और उस बिच्छू को, बिना नुकसान पहुंचाए, उन पर वापस डाल दें।

बुल्ले शाह का मूल नाम अब्दुल्लाशाह था|

भूमिका:
पंजाब की माटी की सौंधी गन्ध में गूंजता एक ऐसा नाम जो धरती से उठकर आकाश में छा गया| वे ही भारतीय सन्त परम्परा के महान कवि थे जो पंजाब की माटी में जन्मे, पले और उनकी ख्याति पूरे देश में फैली| ऐसे ही पंजाब के सबसे बड़े सूफी बुल्ले शाह जी हुए हैं|
परिचय:
बुल्ले शाह का मूल नाम अब्दुल्लाशाह था| आगे चलकर इनका नाम बुल्ला शाह या बुल्ले शाह हो गया| प्यार से इन्हें साईं बुल्ले शाह या बुल्ला कहते| इनके जीवन से सम्बन्धित विद्वानों में अलग-२ मतभेद है| इनका जन्म 1680 में उच गीलानियो में हुआ| इनके पिता शाह मुहम्मद थे जिन्हें अरबी, फारसी और कुरान शरीफ का अच्छा ज्ञान था| वह आजीविका की खोज में गीलानिया छोड़ कर परिवार सहित कसूर (पाकिस्तान) के दक्षिण पूर्व में चौदह मील दूर "पांडो के भट्टिया" गाँव में बस गए| उस समय बुल्ले शाह की आयु छे वर्ष की थी| बुल्ले शाह जीवन भर कसूर में ही रहे|
इनके पिता मस्जिद के मौलवी थे| वे सैयद जाति से सम्बन्ध रखते थे| पिता के नेक जीवन के कारण उन्हें दरवेश कहकर आदर दिया जाता था| पिता के ऐसे व्यक्तित्व का प्रभाव बुल्ले शाह पर भी पड़ा| इनकी उच्च शिक्षा कसूर में ही हुई| इनके उस्ताद हजरत गुलाम मुर्तजा सरीखे ख्यातनामा थे| अरबी, फारसी के विद्वान होने के साथ साथ आपने इस्लामी और सूफी धर्म ग्रंथो का भी गहरा अध्ययन किया|..... 

भक्त नामदेव जी का जन्म जिला सतार मुंबई गाँव नरसी ब्राह्मणी में कार्तिक सुदी संवत 1327 विक्रमी को हुआ|

भूमिका:
परमात्मा ने सब जीवो को एक - सा जन्म दिया है| माया की कमी या फिर जीवन के धंधो के कारण लोगो तथा कई चालाक पुरुषों ने ऐसी मर्यादा बना दी कि ऊँच - नीच का अन्तर डाल दिया| उसी अन्तर ने करोडों ही प्राणियों को नीचा बताया| परन्तु जो भक्ति करता है वह नीच होते हुए भी पूजा जाता है| भक्ति ही भगवान को अच्छी लगती है| भक्ति रहित ऊँचा जीवन शुद्र का जीवन है|'
भक्त नामदेव जी का जन्म जिला सतार मुंबई गाँव नरसी ब्राह्मणी में कार्तिक सुदी संवत 1327 विक्रमी को हुआ| आपकी माता का नाम गोनाबाई  तथा पिता का नाम सेठी था| ये छींबा जाति से सम्बन्ध रखते थे|वे कपड़े धोते व छापते थे| सेठी बहुत ही नेक पुरुष था|वे सदा सच बोलते व कर्म करते रहते थे|
पिता की नेकी का असर पुत्र पर भी पड़ा| वहा भी साधू संतो के पास बैठता| वह उनसे उपदेश भरे वचन सुनता रहता| उनके गाँव मैं देवता का मन्दिर था| जिसे विरोभा देव का मन्दिर कहा जाता था| वहाँ जाकर लोग बैठते व भजन करते थे| वह भी बच्चो को इकट्ठा करके भजन - कीर्तन करवाता| सभी उसको शुभ बालक कहते थे| 
वह बैरागी और साधू स्वभाव का हो गया| कोई काम काज भी न करता और कभी - कभी काम काज करता हुआ राम यश गाने लगता| एक दिन पिता ने उससे कहा - बेटा कोई काम काज करो| अब काम के बिना गुजारा नहीं हो सकता| कर्म करके ही परिवार को चलाना है| अब तुम्हारा विवाह भी हो चुका है|
"विवाह तो अपने कर दिया" नामदेव बोला| लेकिन मेरा मन तो भक्ति में ही लगा हुआ है| क्या करूँ? जब मन नहीं लगता तो ईश्वर आवाजें मरता रहता है| 
बेटा! भक्ति भी करो| भक्ति करना कोई गलत कार्य नहीं है लेकिन जीवन निर्वाह के लिए रोजी भी जरुरी है| वह भी कमाया करो| ईश्वर रोजी में बरकत डाले गा| 
नामदेव जी की शादी छोटी उम्र में ही हो गई| उनकी पत्नी का नाम राजाबाई था| नामदेव का कर्म - धर्म भक्ति करने को ही लोचता था| पर उनकी पत्नी ने उन्हें व्यापार कार्य में लगा दिया| परन्तु वह असफल रहा| 
 भाई गुरदास जी भी फरमाते हैं - 

---३६६
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भक्त नामदेव जी जो जाति से छींबा थे अपना ध्यान प्रभु भक्ति में लगाया हुआ था| एक दिन उच्च जाति के क्षत्रिय व ब्राह्मण मन्दिर में बैठकर प्रभु यश गान कर रहे थे| जब उन्होंने देखा कि निम्न जाति का नामदेव उनके पास बैठ कर प्रभु की भक्ति कर रहा है, तो उन्होंने उसे पकड़कर संगत से उठा दिया| वह देहुरे मन्दिर के पिछले भाग के पास जाकर प्रभु का नाम जपने लगा| भगवान ने ऐसी लीला रची कि देहुरे का मुँह घुमा दिया| यह उस तरफ हो गया जहाँ नामदेव जी बैठे थे| उच्च जाति के लोग यह देखकर हैरान रह गए| प्रभु के दर पर तो निमानो को भी मान मिलता है| प्रभु का प्रेम भी निम्न लोगों की ओर ही जाता है| जैसे नीर नीचे स्थान की ओर बहता है ऊँचाई की तरफ नहीं जाता|
ठाकुर को दूध पिलाना:
एक दिन नामदेव जी के पिता किसी काम से बाहर जा रहे थे| उन्होंने नामदेव जी से कहा कि अब उनके स्थान पर वह ठाकुर की सेवा करेंगे जैसे ठाकुर को स्नान कराना, मन्दिर को स्वच्छ रखना व ठाकुर को दूध चढ़ाना| जैसे सारी मर्यादा मैं पूर्ण करता हूँ वैसे तुम भी करना| देखना लापरवाही या आलस्य मत करना नहीं तो ठाकुर जी नाराज हो जाएँगे|
नामदेव जी ने वैसा ही किया जैसे पिताजी समझाकर गए थे| जब उसने दूध का कटोरा भरकर ठाकुर जी के आगे रखा और हाथ जोड़कर बैठा व देखता रहा कि ठाकुर जी किस तरह दूध पीते हैं? ठाकुर ने दूध कहाँ पीना था? वह तो पत्थर की मूर्ति थे| नामदेव को इस बात का पता नहीं था कि ठाकुर को चम्मच भरकर दूध लगाया जाता व शेष दूध पंडित पी जाते थे| उन्होंने बिनती करनी शुरू की हे प्रभु! मैं तो आपका छोटा सा सेवक हूँ, दूध लेकर आया हूँ कृपा करके इसे ग्रहण कीजिए| भक्त ने अपनी बेचैनी इस प्रकार प्रगट की - 
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हे प्रभु! यह दूध मैं कपला गाय से दोह कर लाया हूँ| हे मेरे गोबिंद! यदि आप दूध पी लेंगे तो मेरा मन शांत हो जाएगा नहीं तो पिताजी नाराज़ होंगे| सोने की कटोरी मैंने आपके आगे रखी है| पीए! अवश्य पीए! मैंने कोई पाप नहीं किया| यदि मेरे पिताजी से प्रतिदिन दूध पीते हो तो मुझसे आप क्यों नहीं ले रहे? हे प्रभु! दया करें| पिताजी मुझे पहले ही बुरा व निकम्मा समझते हैं| यदि आज आपने दूध न पिया तो मेरी खैर नहीं| पिताजी मुझे घर से बाहर निकाल देंगे|
जो कार्य नामदेव के पिता सारी उम्र न कर सके वह कार्य नामदेव ने कर दिया| उस मासूम बच्चे को पंडितो की बईमानी का पता नहीं था| वह ठाकुर जी के आगे मिन्नतें करता रहा| अन्त में प्रभु भक्त की भक्ति पर खिंचे हुए आ गए| पत्थर की मूर्ति द्वारा हँसे| नामदेव ने इसका जिक्र इस प्रकार किया है - 
ऐकु भगतु मेरे हिरदे बसै|| 
नामे देखि नराइनु हसै|| (पन्ना ११६३)
 एक भक्त प्रभु के ह्रदय में बस गया| नामदेव को देखकर प्रभु हँस पड़े| हँस कर उन्होंने दोनों हाथ आगे बढाएं और दूध पी लिया| दूध पीकर मूर्ति फिर वैसी ही हो गई| 
दूधु पीआई भगतु घरि गइआ ||
नामे हरि का दरसनु भइआ|| (पन्ना ११६३ - ६४)
दूध पिलाकर नामदेव जी घर चले गए| इस प्रकार प्रभु ने उनको साक्षात दर्शन दिए| यह नामदेव की भक्ति मार्ग पर प्रथम जीत थी| 
शुद्ध ह्रदय से की हुई प्रर्थना से उनके पास शक्तियाँ आ गई| वह भक्ति भव वाले हो गए और जो वचन मुँह निकलते वही सत्य होते| जब आपके पिताजी को यह ज्ञान हुआ कि आपने ठाकुर में जान डाल दी व दूध पिलाया तो वह बहुत प्रसन्न हुए| उन्होंने समझा उनकी कुल सफल हो गई है| 
परलोक गमन:
आपने दो बार तीर्थ यात्रा की व साधू संतो से भ्रम दूर करते रहे| ज्यों ज्यों आपकी आयु बढती गई त्यों त्यों आपका यश फैलता गया| आपने दक्षिण में बहुत प्रचार किया| आपके गुरु देव ज्ञानेश्वर जी परलोक गमन कर गए तो आप भी कुछ उपराम रहने लग गए| अन्तिम दिनों में आप पंजाब आ गए| अन्त में आप अस्सी साल की आयु में 1407 विक्रमी को परलोक गमन कर गए| 
साहित्यक देन:
नामदेव जी ने जो बाणी उच्चारण की वह गुरुग्रंथ साहिब में भी मिलती हैं| बहुत सारी बाणी दक्षिण व महाराष्ट्र में गाई जाती है| आपकी बाणी पढ़ने से मन को शांति मिलती है व भक्ति की तरफ मन लगता है| 

jai ho


गुरु रविदास जी 15 और 16 वी शताब्दी में भक्ति अभियान के उत्तर भारतीय आध्यात्मिक सक्रीय कवी-संत थे।

गुरु रविदास जी 15 और 16 वी शताब्दी में भक्ति अभियान के उत्तर भारतीय आध्यात्मिक सक्रीय कवी-संत थे। पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र में उन्हें गुरु कहा जाता है। और रविदास जी के भक्ति गीतों ने भक्ति अभियान पर एक आकर्षक छाप भी छोड़ी थी। संत रविदास एक कवी-संत, सामाजिक सुधारक और आध्यात्मिक व्यक्ति थे। रविदास 21 वि शताब्दी में गुरु रविदास जी धर्म के संस्थापक थे।

गुरु रविदास जी के भक्ति गीतों में सिक्ख साहित्य, गुरु ग्रन्थ साहिब शामिल है। पञ्च वाणी की दादूपंथी परंपरा में भी गुरु रविदास जी की बहुत सी कविताये शामिल है। गुरु रविदास ने समाज से सामाजिक भेदभाव और जाती प्रथा और लिंग भेद को हटाने का बहोत प्रभाव पड़ा। उनके अनुसार हर एक समाज में सामाजिक स्वतंत्रता का होना बहुत जरुरी है।
संत रविदास को कभी संत, गुरु और कभी-कभी रविदास, रायदास और रुहिदास भी कहा जाता था।
रविदास के जीवन चरीत्र की पर्याप्त जानकारी भी उपलब्ध नही है। लेकिन बहुत से विद्वानों का ऐसा मानना है की श्री गुरु रविदासजी का जन्म 15 वि शताब्दी में भारत के उत्तर प्रदेश के कांशी (बनारस) में हुआ था। हर साल उनका जन्मदिन पूरण मासी के दिन माघ के महीने में आता है। उनकी माता का नाम माता कालसी जी और पिता का नाम बाबा संतोख दास जी था।
गुरु रविदासजी – Guru Ravidass सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध थे, वे हमेशा से ही जातिभेद, रंगभेद के खिलाफ लड़ रहे थे। बचपन से ही उन्हें भक्तिभाव काफी पसंद था, बचपन से ही भगवान पूजा में उन्हें काफी रूचि थी। परम्पराओ के अनुसार रविदास पर संत-कवी रामानंद का बहोत प्रभाव पड़ा। उनकी भक्ति से प्रेरित होकर वहा के राजा भी उनके अनुयायी बन चुके थे।
गुरु रविदास वैश्विक बंधुता, सहिष्णुता, पड़ोसियों के लिये प्यार और देशप्रेम का पाठ पढ़ाते थे।
गुरु रविदास ने गुरु नानक देव की प्रार्थना पर पुरानी मनुलिपि को दान करने का निर्णय लिया। उनकी कविताओ का संग्रह श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में देखा जा सकता है। बाद में गुरु अर्जुन देव जी ने इसका संकलन किया था, जो सिक्खो के पाँचवे गुरु थे। सिक्खो की धार्मिक किताब गुरु ग्रन्थ साहिब में गुरु रविदास के 41 छन्दों का समावेश है।
ऐसा कहा जाता है की गुरु रविदास जी इस दुनिया से काफी नाराज़ थे और अपने पीछे केवल अपने पदचिन्ह ही छोड़ गए थे। कुछ लोगो का मानना था की अपने अंतिम दिनों में वे बनारस में रहते थे।
आज भी सन्त रविदास के उपदेश समाज के कल्याण तथा उत्थान के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने अपने आचरण तथा व्यवहार से यह प्रमाणित कर दिया है कि मनुष्य अपने जन्म तथा व्यवसाय के आधार पर महान नहीं होता है।
विचारों की श्रेष्ठता, समाज के हित की भावना से प्रेरित कार्य तथा सद्व्यवहार जैसे गुण ही मनुष्य को महान बनाने में सहायक होते हैं। इन्हीं गुणों के कारण संत रविदास को अपने समय के समाज में अत्यधिक सम्मान मिला और इसी कारण आज भी लोग इन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं।
मीरा बाई –
राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में मीरा के मंदिर के आमने एक छोटी छत्री है जिसमे हमें रविदास के पदचिन्ह दिखाई देते है। विद्वान रविदास जी को मीरा बाई का गुरु भी मानते है। संत मीराबाई और संत रविदास दोनों ही भक्तिभाव से जुड़े हुए संत-कवी थे। लेकिन उनके मिलने का इतिहास में कोई सबुत नही है।

http://www.gyanipandit.com/guru-ravidass-ji-history-in-hindi/